भीगीसी रैन पलकोंमे समाये,
कहा चला वो हमसफर मेरा?
रौशनी भी मुखडा छुपाये हुये,
मजाक उडाये इस कदर मेरा.

ये गम भी बडा अजब मिजाज हैं
आंखोंसे आंसुओंमे बेहता नही
कुछ कोरे पन्नों पे भी दिल के
स्याही बनकर कभी रेहता नही.

ये खयाल न जाने हमेशा क्यू आये
के इस अधूरेपन की आखिर सजा क्या हैं
ऐ मेरे दिल के हमराज इतना तो बता
दिल मे समेटे दर्द की वजह क्या हैं?

आज की इस खुमारी रात मे ही सही
चंद पलोंका सुकून ही दिला दो.
खोये है खुद अपने इन्तशार मे इतने
हो सके तो हमे हमसे ही मिला दो.

सोचते सोचते न जाने फिर क्यू
एक आंसू तितली सा उड जाता हैं,
रूखे से सावन में भी चांद वो
शरमाए बगैर ही चले आता हैं.

अब तो उम्मीद सिर्फ पन्नोंपे रहती हैं
इसे जिंदगी में फिरसे लाऊ भी तो क्यू?
सुबह की रौशनी दिल पे लगा बैठू
तो इस रात को भूल जाऊ भी तो क्यू?

यू सुकून ही कही तरसाए ना हमे
के बेजार हो उस तन्ज के खुमार में,
इस दिल को कही मेहफूज रखना,
लिपटा पडा हैं ये खुदके इन्तशार में!

Soham Ballal
Non – Rotaractor

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